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“मेरी 19 साल की बेटी पिछले दो महीने से जेल में बंद है. उसने कौन सा गुनाह किया है? एक कविता ही तो लिखी थी. वह बहुत मेधावी छात्रा है. हम पति-पत्नी दूसरों के घरों में मज़दूरी करके उसे पढ़ा रहे हैं. अगर उसे जेल से बाहर नहीं निकाला गया तो उसका भविष्य ख़त्म हो जाएगा.”
असम के गोलाघाट ज़िले की एक जेल में बंद बरसाश्री बुरागोहाईं की मां उषा इतना कहते ही भावुक हो जाती हैं.
दरअसल, असम पुलिस ने बरसाश्री को कथित तौर पर प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन उल्फा (आई) के समर्थन में ‘कविता लिखने’ के आरोप में दो महीने पहले 18 मई को गिरफ़्तार किया था. पुलिस ने बरसाश्री को गोलाघाट ज़िले के सरूपथार से तब गिरफ़्तार किया था, जब वो अपनी एक सहेली के घर घूमने गई थीं.
जोरहाट के डीसीबी गर्ल्स कॉलेज में बीएससी गणित के द्वितीय वर्ष की छात्रा बरसाश्री को ग़ैरक़ानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम अर्थात यूएपीए की धारा 10 और 13 के तहत गिरफ़्तार किया गया है.
बरसाश्री ने पिछले कुछ महीनों में करीब आठ कविताएं लिखी थी, जिन्हें वो अपने फ़ेसबुक पर साझा कर रही थीं. लेकिन अब उन सभी कविताओं को उनके फ़ेसबुक से डिलीट करा दिया गया है.
असम पुलिस ने बरसाश्री के फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल पर अपडेट की गई एक पोस्ट का स्वत: संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज किया था.
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‘हम दिहाड़ी मज़दूरी करके बेटी को पढ़ाते हैं’
बरसाश्री के पिता अजीत बुरागोहाईं ने पुलिस की कार्रवाई पर बात करते हुए बीबीसी हिंदी से कहा, “पुलिस ने एफ़आईआर में जिस कविता के लिए मेरी बेटी पर आरोप लगाए है, उसमें किसी भी चरमपंथी संगठन का नाम नहीं लिया गया है.”
वे कहते हैं, ”हम ग़रीब लोग हैं और हमारा जीवन बहुत संघर्ष से भरा है. मैं दिहाड़ी मजदूरी करके अपनी बेटी को पढ़ा रहा था. हमारा परिवार किसी भी चरमपंथी संगठन का समर्थन नहीं करता.”
जोरहाट से एनएच 37 पर डिब्रूगढ़ की तरफ महज़ 30 किलोमीटर आगे पहुंचने पर एक छोटा सा शहर टियोक आता है. वहां से बरसाश्री के गांव कटारिखाम गरमूर तक जाने वाली कच्ची सड़क उस इलाक़े में बसे लोगों की बदहाली का अहसास दिलाती है.
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झांजी नदी के किनारे बसे कटारिखाम गांव में अंतिम घर बरसाश्री का ही है, जहां मानसून के दौरान हर साल बाढ़ भारी तबाही लेकर आती है.
जब मैं उनके घर पहुंचा तो टीन और बांस पर कच्ची मिट्टी के लेप से बने दो कमरों के घर के बाहर उनके कई रिश्तेदार खड़े हुए थे. इन दिनों बरसाश्री के घर पर कई राजनीतिक दलों के नेताओं का भी आना-जाना लगा हुआ है.
आर्थिक तौर पर कमज़ोर परिवार से आने वाली बरसाश्री ने 10वीं और 12वीं की परीक्षा में कई विषयों में लेटर मार्क्स (किसी भी विषय में न्यूनतम 80% अंक) के साथ बहुत अच्छे नंबर हासिल किए थे, जिसकी चर्चा आज भी उनके गांव वाले करते हैं.
लिहाजा पिछड़े इलाके की इस मेधावी छात्रा की गिरफ़्तारी को लेकर कई लोगों ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए सरकार पर सवाल खड़े किए हैं.
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‘जेल में रही तो जीवन बर्बाद हो जाएगा’

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बरसाश्री के बारे में पूछने पर उनकी मां उषा धीमी आवाज़ में कहती हैं, “मैं उसकी पढ़ाई को लेकर बहुत चिंतित हूं. हम दिहाड़ी मज़दूरी कर अपनी बेटी को पढ़ा रहे थे. अगर वो जेल में रही तो उसका जीवन बर्बाद हो जाएगा. वो घर की आर्थिक स्थिति को समझती है, इसलिए बचपन से ही पढ़ाई में तेज़ रही है.”
उनकी मां कहती हैं, ”12वीं की परीक्षा पास करने के बाद उसने मेडिकल की पढ़ाई के लिए NEET की परीक्षा भी पास की थी, लेकिन पैसों की तंगी के चलते हम अपनी बेटी का दाख़िला नहीं करा सके.”
सोशल मीडिया पर कुछ लोग बरसाश्री की आर्थिक समस्याओं और उच्च शिक्षा हासिल करने के उनके लंबे समय से किए जा रहे संघर्ष को उनकी कुछ कविताओं में व्यक्त भावनाओं से जोड़ कर देख रहे हैं.
बरसाश्री ने अपने फ़ेसबुक पर एक तस्वीर के साथ कैप्शन में लिखा है, “तुम्हारे प्यार को जीतने के लिए कलम ही मेरा हथियार है.”
बरसाश्री की असमिया भाषा में लिखी गई जिन पंक्तियों के चलते उन पर कार्रवाई हुई है, उसमें उन्होंने लिखा था, ‘स्वाधीन हुरूजोर दिक्खे आकोउ एखुज, आकोउ कोरिम रास्ट्रो द्रुह.’ इसका मतलब ‘आज़ादी के सूरज की ओर एक और क़दम, एक बार फिर, मैं देशद्रोह करूंगी’ होता है.
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क्या है असम पुलिस का दावा
असम पुलिस उनकी इन पंक्तियों को यहां सक्रिय प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन उल्फा-आई के समर्थन से जोड़कर देख रही है. पुलिस इसे एक तरह से एक बड़े ‘आपराधिक साज़िश’ और ‘भारत सरकार के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने के इरादे’ से जोड़ रही है.
असम पुलिस के विशेष डीजीपी (क़ानून और व्यवस्था) जीपी सिंह ने बीते बुधवार को एक ट्वीट करके इस बारे में बताया. उन्होंने बरसाश्री की उन पंक्तियों का हवाला देते हुए लिखा, ”असल में उनके फ़ेसबुक पोस्ट में राज्य के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने का एक विशेष आह्वान किया गया है- ‘आकोउ कोरिम रास्ट्रो द्रुह (मैं देशद्रोह करूंगी).’
पोस्ट Twitter समाप्त, 1
पुलिस अधिकारी जीपी सिंह ने कहा, “जब कोई सार्वजनिक रूप से प्रतिबंधित संगठन के प्रति समर्थन का दावा करता है और भारत सरकार के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने के इरादे का एलान करता है, तो हम क़ानूनी रूप से उस व्यक्ति पर मुक़दमा चलाने को बाध्य हैं.”
उन्होंने आगे लिखा, ”उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए सक्षम न्यायालय में आरोप पत्र दाख़िल किया जाएगा. क़ानून को अपना काम करने दें.”
हालांकि दो दिन बाद असम के डीजीपी भास्कर ज्योति महंत ने कहा है कि पुलिस ने बरसाश्री को कविता लिखने के लिए गिरफ़्तार नहीं किया.
उन्होंने मीडिया से कहा, “मुझे जानकारी मिली है कि वो उल्फा-आई में जाने की तैयारी कर रही थीं. पुलिस ने उन्हें कविता लिखने के लिए नहीं पकड़ा है. ये सब झूठी बातें है. हमें कविता लिखने से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन वो ख़ुद उल्फा में जाना चाहती हैं और दूसरों को भी उल्फा में ले जाना चाहती हैं. ये सब कुछ उन्होंने लिख रखा है. इसलिए उन्हें पकड़ा गया है.”
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सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने क्या कहा
वहीं सोशल मीडिया पर बरसाश्री की रिहाई को लेकर आ रही प्रतिक्रियाओं के बाद मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने कहा, “कविता लिखने के लिए बरसाश्री को गिरफ़्तार नहीं किया है. कुछ लोग सोशल मीडिया पर इस बात को ग़लत तरीक़े से प्रसार कर रहे हैं.”
मुख्यमंत्री ने आगे कहा, ”अगर हम उन्हें छोड़ देते हैं और वो लापता हो जाती हैं. उसके बाद उल्फा-आई से कोई बयान जारी कर कहे कि उन्हें (बरसाश्री) मृत्युदंड दिया जाएगा तो कौन उसकी ज़िम्मेदारी लेगा.”
इस बीच गोलाघाट ज़िले की एक स्थानीय अदालत ने बरसाश्री को 16 जुलाई से शुरू हो रही बीएससी गणित के स्नातक पाठ्यक्रम के दूसरे सेमेस्टर की परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी है.
इससे पहले बरसाश्री ने जेल अधिकारियों के ज़रिए गोलाघाट ज़िला एवं सत्र न्यायालय में एक याचिका दायर कर परीक्षा में बैठने की अनुमति मांगी थी.
ज़िला अदालत ने गुरुवार को जेल अधिकारियों को ज़रूरी व्यवस्था करने और जेल से उनके परीक्षा केंद्र तक पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराने का निर्देश भी दिया.
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बरसाश्री की परीक्षा को लेकर उनकी मां कहती है, “मैं जब जेल में उससे मिलने गई थी, तो वो अपनी पढ़ाई को लेकर बहुत परेशान थी. वो मुझसे पूछ रही थी कि मां कब ज़मानत मिलेगी. मैं अपनी फ़ाइनल परीक्षा दे पाऊंगी या नहीं. हम अदालत के शुक्रगुजार हैं कि मेरी बेटी को परीक्षा देने की अनुमति दी गई है.”
वो कहती हैं, ”असल में वो एक साधारण लड़की है वो ऐसे अलगाववादी संगठन में जाने की सोच भी नहीं सकती. वो बहुत डरपोक लड़की है, जो रात में सपना देखकर डर जाती है.”
क्रांतिकारी कविताएं लिखने से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए बरसाश्री के पिता अजीत बुरागोहाईं कहते हैं, “वो बहुत पढ़ाई करना चाहती है, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण हम उसकी उतनी मदद नहीं कर पा रहे हैं, जितनी एक मेधावी बच्चे की करनी चाहिए थी.”
वो कहते हैं, ”मुझे नहीं मालूम कि मेरी बेटी ने किस तरह की क्रांतिकारी कविताएं लिखी हैं, लेकिन एक बाप होने के नाते ये ज़रूर कह सकता हूं कि उसका मक़सद किसी भी चरमपंथी संगठन का समर्थन करना नहीं है. हमारा परिवार ऐसे किसी भी चरमपंथी संगठन का कोई समर्थन नहीं करता. सरकार से ये गुज़ारिश है कि मेरी बेटी को जल्द से जल्द रिहा कर दें.”
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उल्फा-आई की सक्रियता
असम में 2019 में नागरिकता संशोधन क़ानून अर्थात सीएए का ज़बरदस्त विरोध हुआ था. उसके बाद से कई युवा चरमपंथी संगठन उल्फा-आई में भर्ती हो गए हैं.
पुलिस का दावा है कि फ़ेसबुक और यूट्यूब जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके उल्फा-आई ने राज्य के कई युवाओं को गुमराह कर अपने संगठन में भर्ती किया है.
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने हाल ही में दावा किया था कि राज्य के क़रीब 47 लड़के और लड़कियां हाल में उल्फा (आई) में शामिल हुए हैं, लेकिन साथ ही उसके कई वरिष्ठ कैडर इस संगठन का साथ छोड़कर मुख्यधारा में लौट आए हैं.
असम में पिछले 41 वर्षों से सक्रिय उल्फा-आई को सेना की तीन प्रमुख उग्रवाद विरोधी अभियानों का सामना करना पड़ा है. इसके बाद संगठन के कई कैडरों ने आत्मसमर्पण कर दिया और कई वरिष्ठ नेता सरकार के साथ बातचीत में शामिल हुए हैं.
हालांकि संगठन के प्रमुख परेश बरूआ आज भी अपने कुछ कैडरों के साथ म्यांमार के जंगलों में छिपे हुए हैं.