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ऑपरेशन ब्लूस्टार से कुछ समय पहले स्वर्ण मंदिर में जरनैल सिंह भिंडरावाले के साथ अक्सर एक लंबी सफ़ेद दाढ़ी और करीने से पगड़ी बाँधने वाले शख़्स को बैठे देखा जाता था.
वो देखने में दुबले-पतले ज़रूर थे लेकिन उनका चेहरा बौद्धिक था. बाहर से वो एक ग्रंथी होने का आभास देते थे, लेकिन वास्तव में वो एक सिपाही थे- ये थे मेजर जनरल शाबेग सिंह जिन्होंने भारतीय सैनिकों के ख़िलाफ़ स्वर्ण मंदिर में व्यूह रचना की थी.
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जब तीन महीनों बाद भारतीय सेना स्वर्ण मंदिर में घुसी थी तो उन्होंने ही करीब 200 अनुयायियों के साथ उसका सामना किया था.
शाबेग सिंह पढ़ने-लिखने के शौकीन थे और सात भाषाएं पंजाबी, फ़ारसी, उर्दू, बांग्ला, गोरखाली, हिंदी और अंग्रेज़ी रवानगी से बोल लेते थे.
कैसी थी मेजर जनरल शाबेग सिंह की शख़्सियत?
मैंने यही सवाल रखा इस समय भिवाड़ी में रह रहे उनके छोटे बेटे प्रबपाल सिंह के सामने.
प्रबपाल सिंह का जवाब था, “वो 5 फ़ुट 8 इंच लंबे थे. बहुत अच्छे एथलीट थे वो. 18 वर्ष की आयु में उन्होंने 100 मीटर दौड़ में भारतीय रिकॉर्ड की बराबरी की थी. इसके अलावा वो बहुत अच्छे घुड़सवार और तैराक भी थे. लेकिन वो हमेशा से ही सेना में भर्ती होना चाहते थे.”

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भारत की तरफ़ से हर लड़ाई में शामिल हुए
अपने सैनिक करियर में उन्होंने भारत की तरफ़ से हर लड़ाई लड़ी थी, चाहे वो दूसरा विश्व युद्ध हो, 1947 में पाकिस्तान का हमला हो या फिर 1962 की भारत-चीन लड़ाई या फिर 1965 और 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध.
प्रबपाल सिंह बताते हैं, “1942 में उनको किंग्स कमीशन मिला था. उन्होंने ब्रिटिश फ़ोर्सेज़ के साथ सिंगापुर और मलाया को आज़ाद करवाया था. वर्ष 1948 में वो कश्मीर में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लड़े, जहां वो ब्रिगेडियर उस्मान के स्टाफ़ ऑफ़िसर थे. जब उस्मान लड़ाई में मारे गए तो वो उनसे 20 ग़ज़ की दूरी पर थे.”
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प्रबपाल सिंह बताते हैं, “1962 की लड़ाई में वो तेजपुर में थे. जो घायल भारतीय सैनिक थे उन्हें वो एक मज़दूर की तरह अपने कंधे पर उठाकर तेजपुर अस्पताल तक लाए थे.”
“1965 की लड़ाई में वो हाजीपीर के मोर्चे पर थे. वो अकेले अफ़सर थे जिनको लेफ़्टिनेंट कर्नल से सीधे ब्रिगेडियर के तौर पर प्रमोट किया गया था. वर्ष 1969 में वो नगालैंड पोस्टिंग पर चले गए थे. जब बांग्लादेश का संघर्ष शुरू हुआ तो उन्हें वहीं से बुलाया गया था.”
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शाबेग से बने बेग

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ड्रामा क्वीन
समाप्त
1971 में जब बांग्लादेश का संघर्ष शुरू हुआ तो भारतीय सेना के प्रमुख सैम मानेक शॉ ने उन्हें दिल्ली तलब किया जहां उन्हें मुक्ति बाहिनी को खड़ा करने और प्रशिक्षण देने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई.
ये एक गुप्त मिशन था क्योंकि भारत दुनिया को ये नहीं दिखाना चाहता था कि वो मुक्ति बाहिनी को प्रशिक्षण दे रहा है. आधिकारिक रूप से भारत ने अभी तक स्वीकार किया नहीं किया है कि उसने मुक्ति बाहिनी को प्रशिक्षित किया है.
पूर्वी कमान के प्रमुख जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा का मानना था कि मुक्ति बाहिनी के प्रशिक्षण में शाबेग सिंह की बहुत बड़ी भूमिका थी.
उस ज़माने में वो परंपरावादी सिख नहीं हुआ करते थे. जब काम का तकाज़ा हुआ तो उन्होंने अपने बाल तक कटा दिए थे.
शाबेग सिंह के बेटे प्रबपाल सिंह बताते हैं, “जब मेरे पिता मुक्ति बाहिनी को ट्रेन कर रहे थे तो हमें पता नहीं था कि वो कहां रह रहे हैं. जब हमने उनसे फ़ोन पर पूछा कि अपना पता तो बता दीजिए तो उन्होंने कहा था मिस्टर बेग, हबीब टेलरिंग हाउज़, अगरतला. जब वो बहुत दिनों तक घर नहीं आए तो मेरी मां ने मेरे बड़े भाई से कहा कि ‘तू छुट्टी ले और जा कर पता लगा तेरे पिता हैं कहां? वो चिट्ठियों का जवाब भी नहीं देते.’ जब मेरे भाई वहां गए तो उन्होंने कहा ‘मैं ठीक हूं. मैं एक अंडरग्राउंड आपरेशन चला रहा हूं. मैं अब ब्रिगेडियर शाबेग नहीं हूँ. अब मेरा नाम बेग है.”

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मुक्ति बाहिनी को ट्रेनिंग दी
ब्रिगेडियर शाबेग सिंह को डेल्टा सेक्टर में मध्य और पूर्वी बांग्लादेश के इलाक़े में मुक्ति बाहिनी के प्रशिक्षण का इंचार्ज बनाया गया था.
उन्होंने पाकिस्तानी सेना को छोड़कर आए कई लोगों जैसे मेजर ज़िया उर रहमान और मोहम्मद मुश्ताक को ट्रेन किया जो बाद में बांग्लादेश के राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष बने.

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शाबेग के प्रयासों से जनवरी से अक्तूबर 1971 तक बांग्लादेश में छापामार आंदोलन इस हद तक बढ़ा कि जब लड़ाई शुरू हुई तो पाकिस्तानी सेना की विरोध करने की इच्छाशक्ति क़रीब-क़रीब ख़त्म हो गई थी.
प्रबपाल सिंह बताते हैं, “मेरे पिता ने मुक्ति बाहिनी को हथियार चलाना सिखाया, छापामार युद्ध की रणनीति समझाई. चटगांव बंदरगाह में उन्होंने एक समय में पांच छोटे पोत उड़ा दिए थे. मुक्ति बाहिनी ने पाकिस्तानी सेना के अफ़सरों पर घात लगाकर हमला करना शुरू किया. वो उनके सैनिक काफ़िलों पर हमला करने लगे, पुल उड़ाने लगे और ये सुनिश्चत करने लगे कि पाकिस्तानी सेना तक राशन न पहुंच पाए. इस सबके लिए ब्रिगेडियर शाबेग सिंह ने उन्हें ट्रेन किया.”
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परम विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित
बांग्लादेश युद्ध में उनकी सेवाओं के लिए भारत सरकार ने ब्रिगेडियर शाबेग सिंह को परम विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया. इससे पहले उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल मिल चुका था.
प्रबपाल सिंह को अब तक याद है जब वो पुरस्कार वितरण समारोह में भाग लेने अपने पिता के साथ राष्ट्रपति भवन गए थे.
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प्रबपाल बताते हैं, “उस समय राष्ट्रपति वीवी गिरि थे. अशोका हॉल में अलंकरण समारोह के बाद उन्होंने पार्टी दी थी. हम लोग खड़े हुए थे. तभी सैम मानेक शॉ की आवाज़ गूंजी, ‘ओय शाबेग, तेरी सिंगनी कित्थे है?’ सब लोग मेरे पिता की तरफ़ देखने लगे. मेरे पिता ने कहा, ‘सर मैं अभी उन्हें लेकर आता हूं’. फिर सैम मेरी मां से मिले. मैंने भी उनसे हाथ मिलाया. उन्होंने एक गोरखा जवान की पत्नी से भी नेपाली में बात की. वो इतने अच्छे इंसान थे कि हर एक से घुलमिल जाते थे.”

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राव फ़रमान अली ने रखा था 10 लाख रुपये का ईनाम
1971 के युद्ध के बाद शाबेग सिंह को जबलपुर में पाकिस्तानी सैनिकों के युद्धबंदी कैंप का इंचार्ज बनाया गया. उसी कैंप में जनरल नियाज़ी और पाकिस्तानी सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को रखा गया था.
एक बार जब शाबेग सिंह युद्धबंदी कैंप जा रहे थे तो उनके बेटे प्रबपाल सिंह ने भी उनके साथ वहां जाने की इच्छा प्रकट की.
प्रबपाल बताते हैं, “जब मै वहां पहुंचा तो वहां पाकिस्तानी सेना के कई बड़े अधिकारी बैठे हुए थे. इतने में मेजर जनरल राव फ़रमान अली कमरे के अंदर आए. आते ही उन्होंने मेरे पिता की तरफ़ ग़ौर से देखा. नियाज़ी ने हंसकर कहा, इस बहरूपिए को नहीं पहचाना? फ़रमान अली बोले, ‘नहीं, लेकिन लगता है मैंने इन्हें कहीं देखा हुआ है.’ मेरे पिताजी ने अपनी पगड़ी उतार दी. फ़रमान अली ने कहा तो ‘यू आर मिस्टर बेग’ मेरे पिताजी ने अपनी पगड़ी पहन कर कहा, ‘आईएम जनरल शाबेग सिंह’.”
उन्होंने कहा, “फिर मैंने फ़रमान अली से पूछा कि आपने इनसे इस लहजे में क्यों बात की? उन्होंने कहा, ‘यू नो योर फ़ादर वाज़ वॉन्टेड डेड ऑर अलाइव फॉर 10 लाख रुपीज़’.”
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प्रबपाल सिंह ने कहा, “मैंने इनके ऊपर इनाम रखा हुआ था कि जो इन्हें ज़िंदा या मुर्दा पकड़ेगा उसे 10 लाख रुपए दिए जाएंगे. जब नियाज़ी ट्रेन से पाकिस्तान वापस जा रहे थे तो मैं उन्हें अपने पिता के साथ स्टेशन छोड़ने गया था. मैंने उन्हें एक मिठाई का डिब्बा और केएल सहगल के छह रिकॉर्ड पैक कर दिए थे. ही वाज़ वेरी टच्ड’.”
जनरल शाबेग सिंह नौकरी से हुए बर्ख़ास्त
इसके बाद उनकी उत्तर प्रदेश में बरेली में तैनाती हो गई थी. बरेली का इलाक़ा काफ़ी बड़ा था, उसके अंदर दो-तीन ट्रेनिंग सेंटर आते थे. वहां एक ऑडिट रिपोर्ट में वित्तीय अनियमितता का पता चला. जनरल शाबेग सिंह ने इसकी तह तक जाने की कोशिश की जो सेना के आला अधिकारियों को पसंद नहीं आया.
नतीजा ये हुआ कि जनरल शाबेग सिंह के रिटायरमेंट से सिर्फ़ एक दिन पहले उन्हें बिना किसी मुक़दमे या कोर्ट मार्शल के नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया गया.
उनकी पेंशन भी रोक दी गई. उन पर भ्रष्टाचार के और आरोप भी लगाए गए. ये आरोप भी लगा कि जबलपुर से स्थानान्तरित होने पर उन्होंने भेंट में एक सिल्वर साल्वर स्वीकार की थी जिसका मूल्य 2500 रुपए था. उन पर अपना मकान बनवाने में अपनी आय के स्रोत से कहीं अधिक धन लगाने का आरोप भी लगाया गया.
ऑपरेशन ब्लू स्टार पर किताब ‘अमृतसर मिसिज़ गांधीज़ लास्ट बैटल’ लिखने वाले सतीश जैकब बताते हैं, “सरकार के इस क़दम ने जनरल शाबेग सिंह को बहुत कटु और सरकार विरोधी बना दिया. उन्होंने सरकार के इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती दी. अदालत ने उनके ख़िलाफ़ लगे आरोपों को ग़लत पाया लेकिन इसके बावजूद सरकार के प्रति उनके रवैये में कोई बदलाव नहीं आया. तभी उन्होंने अपने मन की शांति के लिए धर्म का सहारा लिया और तभी वो जरनैल सिंह भिंडरावाले के प्रभाव में आए.”
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जब जनरल शाबेग ने सतीश जैकब को डांटा
सतीश जैकब एक और किस्सा बताते हैं, “भिंडरावाले को मैं बहुत पहले से जानता था, क्योंकि मैं अक्सर उनका इंटरव्यू लिया करता था. भिंडरावाले अक्सर ज़मीन पर ही बैठा करते थे. उनके पीछे गाव तकिया लगी रहती थी. “
वो कहते हैं, “एक दिन मैं उनके पास बैठा हुआ था. एक जगह पड़े पड़े मेरा पैर थक गया था. मैंने उसे आराम देने के लिए उसे थोड़ा फैलाया तो वो भिंडरावाले से छू गया. बगल में बैठे जनरल शाबेग सिंह ने मेरी तरफ़ नाराज़गी से देखते हुए मुझे टोका और कहा, ज़रा संभल कर. संतजी नाराज़ हो जाएंगे.”
“शाबेग को शायद ये अंदाज़ा नहीं था कि भिंडरावाले मुझे अच्छी तरह से जानते थे. जब भिंडरावाले ने मुझे जनरल शाबेग से बात करते हुए देखा तो पूछ बैठे, जनरल से तुम्हारी क्या बात हो रही है? मैंने बात को टालने की कोशिश की लेकिन भिंडरावाले ने ज़ोर दिया कि मैं उन्हें बताऊं कि हम दोनों के बीच क्या बात हो रही थी? जब मैंने उन्हें बताया कि जनरल मुझे आगाह कर रहे थे कि मैं आप से बदतमीज़ी न करूं तो भिंडरावाले सुनकर हंसने लगे. “
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स्वर्ण मंदिर की व्यूह रचना
भिंडरावाले के कहने पर जनरल शाबेग स्वर्ण मंदिर में जाकर रहने लगे. भिंडरावाले ने उन्हें स्वर्ण मंदिर के रक्षा की ज़िम्मेदारी सौंपी.
तीन महीनों से अधिक समय तक वहां रहकर उन्होंने वो सब कुछ किया जिससे भारतीय सैनिकों का स्वर्ण मंदिर में घुसना मुश्किल से मुश्किल बना दिया जाए.
प्रबपाल सिंह कहते हैं, “लोग कहते थे कि शाबेग सिंह गुरिल्ला टैक्टिक्स के हो ची मिन्ह हैं. उन्होंने तयख़ाने और मेन होल के नीचे अपने लड़ाकों को तैनात कर भारतीय सैनिकों के पैर को निशाना बनाने के लिए कहा. ज़्यादातर भारतीय सैनिकों के पैरों में गोलियां लगीं. उनको पता ही नहीं था कि गोलियां कहां से आ रही थीं.”
“सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार में अपने सर्वश्रेष्ठ कमांडो भेजे सफ़ेद संगमरमर की बैकग्राउंड पर काले कपड़े पहना कर. अंधेरे में वो तुरंत सिख अलगाववादियों की गोलियों का निशाना बन गए.”
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बाद में भारत के सेनाध्यक्ष बने जनरल वीके सिंह ने अपनी आत्मकथा, ‘करेज एंड कनविक्शन’ में लिखा, “मेजर जनरल शाबेग सिंह की देखरेख में स्वर्ण मंदिर की रक्षा की योजना तैयार की गई. सभी हथियारों को ज़मीन से कुछ ही इंच की ऊंचाई पर रखा गया.”
“इसका मतलब ये हुआ कि न सिर्फ़ आक्रामक बलों के पैर उखड़ गए बल्कि उनके रेंग कर आगे बढ़ने का विकल्प भी समाप्त हो गया, क्योंकि अगर वो ऐसा करते तो गोली उनके सिर में लगती. “
“हमले से पहले जनरल बरार ने सादे कपड़ों में स्वर्ण मंदिर के अंदर जाकर हालात का जाएज़ा लिया. दूरबीन से सारा नज़ारा देख रहे शाबेग सिंह ने उन्हें तुरंत पहचान लिया लेकिन उन्होंने अपने लड़ाकों से कहा कि जनरल बरार से न उलझा जाए.”
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भारतीय जनरलों से शाबेग के आकलन में भूल
बाद में वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने इंडियन एक्सप्रेस के 4 जून, 2014 के अंक में ‘द ऑडेसिटी ऑफ़ इनकॉम्पिटेंस’ शीर्षक से लिखे लेख में लिखा, “भारतीय जनरलों ने इस बात की अनदेखी कर दी कि उनका मुक़ाबला अनाड़ियों से नहीं बल्कि ऐसे लोगों से है जिनका नेतृत्व उन जैसा ही शख़्स कर रहा है और वो शख़्स अगर उनसे बेहतर नहीं तो उनके बराबर ज़रूर है. वो उन सबके साथ काम कर चुका है और उसने बांग्लादेश की लड़ाई के समय मुक्ति बाहिनी के योद्धाओं को ट्रेन कर नाम कमाया है.”
शेखर गुप्ता लिखते हैं, “स्वर्ण मंदिर की रक्षा में किसी बहुत बड़ी रणनीति या पुराने ज़माने की छापामार लड़ाई का सहारा नहीं लिया गया था बल्कि वो किसी भवन का बटालियन स्तर के सैनिकों द्वारा किया गया सुनियोजित रक्षण था.”
“उन्होंने एक फ़ुटबॉल के मैदान के आधे के बराबर क्षेत्र को पूरी तरह से कवर किया हुआ था जहां से भारतीय सैनिकों को अपने आप को खुले में दिखाते हुए आगे बढ़ना था. ये उनकी नज़र में पहले से तय किया गया ‘किलिंग ग्राउंड’ था जिसे सेना की भाषा में FIBUA ( फ़ाइटिंग इन बिल्ट अप एरियाज़) कहा जाता है. “
“शाबेग को ये ग़लतफ़हमी नहीं थी कि उनकी जीत होगी. वो जितना संभव हो भारतीय सैनिकों को हताहत करना चाहते थे ताकि वो अपरिहार्य को कुछ देर तक टाल सकें ताकि सुबह होने तक वहां इतनी भीड़ इकट्ठा हो जाए कि सैनिक कार्रवाई रोक देनी पड़े. अगर भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर में टैंक नहीं भेजे होते तो वो अपने उद्देश्य में बहुत हद तक सफल रहते.”
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जनरल शाबेग की मौत
जनरल कुलदीप बरार अपनी क़िताब ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार द ट्रू स्टोरी’ में लिखते हैं, “हमें जनरल शाबेग सिंह का शव तहख़ाने में मिला. मरने के बाद भी उन्होंने अपने हाथ में कारबाइन पकड़ी हुई थी. उनका वॉकी टॉकी उनके शव के पास ज़मीन पर पड़ा हुआ था.”

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लेकिन जनरल शाबेग सिंह के बेटे प्रबपाल सिंह उनकी मौत का दूसरा ही विवरण देते हैं.
वो कहते हैं, “मैं कई लोगों से मिला था जिन्हें ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद जोधपुर जेल में भेज दिया गया था. उन्होंने मुझे बताया कि जनरल शाबेग सिंह की मौत पहले ही दिन यानी 5 जून को हो गई थी.”
वो कहते हैं कि सरकार ने छह तारीख को उनकी मृत्यु की घोषणा की जबकि वो एक दिन पहले ही मर गए थे.
वो कहते हैं, “उन्हें सात गोलियां लगी थीं मशीनगन के एक बर्स्ट की. भिंडरावाले ने उनकी बॉडी को लिटाकर उसकी अरदास की. उन्होंने बॉडी को साफ़ किया. फिर वो बॉडी को तयख़ाने में ले गए. जब आर्टिलरी का फ़ायर आया तो उनकी बॉडी गिरने वाले मलबे में दब गई. “
मार्क टली और सतीश जैकब अपनी क़िताब ‘अमृतसर, मिसेज़ गांधीज़ लास्ट बैटल’ में लिखते हैं, “9 जून तक शाबेग सिंह का शव पोस्टमार्टम के लिए नहीं लाया गया था. लेकिन तब भी उनका पूरा पोस्टमार्टम नहीं हो सका क्योंकि उनका शरीर नष्ट होना शुरू हो गया था. “
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सरकार का शाबेग सिंह का शव देने से इंकार
जब शाबेग सिंह के परिवारजनों को उनकी मृत्यु के बारे में पता चला तो उनकी बहू ने सेनाध्यक्ष जनरल वैद्य को फ़ोन कर पूछा कि हमें पता चला है कि हमारे ससुर की ऑपरेशन ब्लू स्टार में मौत हो गई है. क्या आप हमें उनके बारे में बता सकते हैं?

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प्रबपाल सिंह कहते हैं, “जनरल वैद्य ने कहा उन्हें इस बारे में कुछ भी पता नहीं. कोई ऑपरेशन ब्लू स्टार नहीं हुआ है. सेना ने कोई एक्शन नहीं लिया है.”
“मैं भागकर चंडीगढ़ पहुंचा. वहां मैंने राज्यपाल बीडी पांडे को फ़ोन कर कहा, ‘मैं अपने पिता का अंतिम संस्कार करना चाहता हूं’. लेकिन गवर्नर पांडे ने कहा कि ‘मैं आपको इसकी इजाज़त नहीं दे सकता क्योंकि अगर मैं ऐसा करता हूं तो मुझे हज़ारों लोगों को इसकी इजाज़त देनी होगी’.”
“तब मैंने उनसे कहा कि क्या आप ये मानते हैं कि इस ऑपरेशन में हज़ारों लोगों की मौत हुई है, तो उन्होंने फ़ोन रख दिया. उसके बाद उन्होंने मुझसे बात ही नहीं की. तीन दिन मैं उनके घर के गेट के बाहर खड़ा रहा कि मैं उनसे अपनी फ़रियाद कह पाऊंगा, लेकिन मुझे सफलता नहीं मिली.”
“मेरे पिता का अंतिम संस्कार कब हुआ, कैसे हुआ, मुझे कुछ भी पता नहीं. उन्होंने न तो हमें उनकी कोई चीज़ दी और न ही उनकी अस्थियां दी.”
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जुलाई 1984 में सरकार द्वारा जारी किए गए श्वेतपत्र में कहा गया कि ऑपरेशन ब्लूस्टार में सेना के 83 जवानों की मौत हुई जिसमें 4 अफ़सर थे.